पहले और अब
पहले और अब
कभी मैं वो इंसान था,
जो दूसरों की मुस्कान के लिए अपनी नींदें खो देता था…
जो किसी के दर्द को देखकर खुद टूट जाता था।
अगर किसी अपने पर ज़रा सी भी आँच आती,
तो मैं बिना सोचे-समझे आग में कूद जाता।
वो “पहले” का मैं था — नर्म दिल, मासूम और भरोसे से भरा हुआ।
लेकिन ज़िंदगी ने मुझे सिखा दिया…
कि हर किसी के लिए आग में कूदने वाला इंसान,
आख़िर में राख बनकर अकेला ही रह जाता है।
जिन्हें बचाने के लिए मैंने खुद को जलाया,
वो ही लोग मेरी राख पर हंसते रहे।
और तभी “अब” का मैं पैदा हुआ।
अब मैं वो इंसान हूँ,
जिसके दिल में न तो रहम है और न ही मोह।
अब मैं खड़ा होकर देख सकता हूँ,
किसी को ज़िंदा जलते हुए —
क्योंकि मैं जान चुका हूँ कि दुनिया सिर्फ़ तुम्हारी कमजोरी का फ़ायदा उठाती है।
अब मेरी चुप्पी भी खतरनाक है,
मेरी नज़रें भी तलवार जैसी हैं,
और मेरा दिल…?
वो अब किसी पर नहीं पिघलता।
पहले मैं किसी के लिए मर सकता था,
अब मैं किसी को मरते हुए देख सकता हूँ।
यही फर्क है — पहले और अब के इंसान में।
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